Sunday, November 19, 2017

रूठने मनाने का सिलसिला पुराना है

दूरियाँ  दिलों  की  सब,  आज अब मिटाना  है।
रूठने   मनाने   का,   सिलसिला    पुराना  है।।

किसको क्या  कहूँ अब मैं?  बेवफ़ा ज़माना है।
आज वह पराया है, अपना' जिसको  जाना है।।

बेकरारियाँ   दिल   को,   रात   दिन   सतायेंगी,
याद  ये  रहेगा  अब,  दिल   नहीं  लगाना  है।।

रात   बीतती   मेरी,   उसके   ही   ख़यालों   में,
मकसद एक अरसे से, जिसको भूल जाना है।।

बेबसी  बयाँ  उससे,   कैसे   मैं   करूँ   अपनी,
होके  जो  जुदा  मुझसे,  बन  गया बिगाना है।।

लुट  गया  दिल उल्फ़त में, नासबूर आशिक़ हूँ,
हासिले  मुहब्बत  क्या?  नाम का फ़साना है।।

देख  अपनी  हालत  को,  आँख डबडबा आई,
'दीप' रागे इश्'रत अब, ग़म का बस तराना है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

Sunday, November 12, 2017

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

अँग्रेजों  ने रण में  जिससे,  इक  दिन  मुँह  की खाई थी।
वह   भारत   माता   की   बेटी,   रानी   लक्ष्मीबाई   थी।।

बचपन  से  ही  जिसने  बरछी  और  तलवार  उठाई थी।
जिसने अपना सब कुछ खोकर, माँ की लाज़ बचाई थी।।

बाँध  पीठ पर   सुत  को  जिसने, रण में धूम मचाई थी।
जिसके  शौर्य  पराक्रम  से  दुश्मन  सेना  चकराई  थी।।

रण  में  जिसने  दोनों  हाथों   से   तलवार   चलाई  थी।
रणचंडी  बनकर  दुश्मन  को, नानी  याद  दिलाई  थी।।

अरिमुण्डों  को  काट-काटकर, जिसने  नदी बहाई  थी।
खट्टे  दाँत  किये  दुश्मन  के,  ऐसी   मार   लगाई   थी।।

समय किसी का सगा न होता, समय ने दृष्टि घुमाई थी।
रानी   एक   शत्रु   बहुतेरे,   पड़ी   सामने   खाई   थी।।

हुए  वार  पर  वार  मगर,  रानी  न  तनिक घबराई  थी।
शायद  अंतिम  बार   लक्ष्मी  ने  तलवार    उठाई   थी।।

अरि  के  सीने  चीर-चीर  कर  जिसने चिता सजाई थी।
उसे  देख कर आँखों  से भी,  जलधारा  बह  आई थी।।

रानी  आज  नहीं  है  लेकिन,  याद  सभी को आई थी।
भस्म  चिता  की उठा सभी ने, अपने शीश लगाई थी।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

Wednesday, November 8, 2017

वफ़ादार को ही सताया गया।

वफ़ादार  को   ही   सताया   गया।
यहाँ  कातिलों  को  बचाया गया।।

सियासी   जमाना    बदस्तूर    है,
हमेशा  वही  रंज़   खाया   गया।।

बज़ाहिर  मुसाफिर  अकेला सही,
मिरा  हाल  कैसा  सुनाया  गया।।

ग़रीबी    हमेशा    रही  है    जवाँ
बुढ़ापा  अमीरी  पे'  लाया गया।।

उसे  भी  वही  तो  रहा   है  गुमाँ,
कि  जैसा उसे  जो बताया गया।।

कसूरों,    फ़रेबों,    गुनाहों  तुम्हें,
कहाँ से कहाँ तक छुपाया गया।।

नहीं  और जीने का' हक चाहिए,
नशेमन  हमारा  जलाया   गया।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'